हिंदी व्याकरण- संस्कृत के उपसर्ग

उपसर्ग-

वे शब्द या अक्षर जो किसी अन्य शब्द या अक्षर से पहले लग कर उसके अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं, उपसर्ग कहलाते हैं| 
हिंदी, संस्कृत, अरबी, फारसी और अंग्रेजी सभी भाषाओँ में उपसर्ग प्रयोग होते हैं| सबसे पहले भाषाओँ की जननी कहलाने वाली संस्कृत के उपसर्गों का अध्ययन करते हैं-

संस्कृत के उपसर्ग-

अ- अन्याय, अभाव, अशिक्षित, अहिंसा, अज्ञान  आदि 
अति- अत्यंत, अत्याचार, अतियुत्तम|
अधि- अध्यक्ष, अध्यादेश, अधिकार, अधिनियम|
अनु- अनुकरण, अनुकूल, अनुचर, अनुज, अनुरोध, अनुभव, अनुवाद, अनुरूप|
अप- अपमान, अपयश, अपव्यय, अपशब्द, अपहरण|
अभि- अभिनेता, अभिमान, अभिभाषण, अभिनेता, अभियान, अभ्यास|
अव- अवकाश, अवगुण, अवसर, अवमूल्यन, अवनति|
आ- आकर्षण, आगमन, आरक्षण, आजन्म, आदान|
उप- उपकार, उपदेश, उपनाम, उपमंत्री, उपवन, उपस्थित|
दुर- दुर्गुण, दुर्घटना, दुर्जन, दुर्दशा, दुराचार, दुर्लभ|
दुस- दुष्कर, दुष्कर्म, दुस्साहस|
निर- निर्जन, निर्दोष, निर्भय, निर्दोष, निर्यात|
निस्- निष्काम, निश्चल, निस्तेज, निस्संदेह|
नि- निबंध, नियम, नियुक्ति, निरोध, निवारण, निवास, निषेध|
परा- पराक्रम, पराजय, परामर्श, पराभव|
परि- परिक्रमा, परिचय, परिणाम, परिधि, परिवर्तन, परीक्षा|
प्र- प्रगति, प्रचार, प्राचार्य, प्रबल, प्राध्यापक, प्रयत्न|
प्रति- प्रतिकूल, प्रतिदिन, प्रतिनिधि, प्रतिबिम्ब, प्रत्यक्ष, प्रतिष्ठा|
वि- विक्रय, विजय, विदेश, विभाग, विपक्ष, वियोग, विज्ञान|
सम् (सं)- संकल्प, संगम, सम्मान, सम्मति, सम्मुख, संरक्षण, संविधान, सम्पूर्ण, संयम, संतोष|
सु- सुगम,  सुदूर, सुपुत्र, स्वच्छ, स्वागत, सुलभ, सुधिक्षित|
अंतर (अंत:)- अंतर्राष्ट्रीय, अंतरजातीय, अंत:प्रांतीय, अन्तर्मुखी|
कु- कुकर्म, कुचक्र, कुपित, कुपात्र, कुरूप|
पुनर्- पुनर्जन्म, पुनरुत्थान, पुनर्विवाह|
प्राक्- प्राक्कथन, प्रागैतिहासिक |
स- सजातीय, सजीव, सफल|
सह- सहकारी, सहगान, सहपाठी, सहमति, सहोदर|
सत्- सत्कर्म, सद्गति, सदाचार, सत्पुरुष|
अध्: अधोगति, अधोपतन, अधोमुखी|
बहित् (बहिर्)- बहिष्कार, बहिर्मुखी, बहिर्गमन|
स्व- स्वकेंद्रित, स्वचालित, स्वतंत्र, स्वराज्य|
पुरा- पुरातन, पुरातत्व|
चिर- चिरकालीन, चिरजीवी, चिरस्थायी|
सं- समकालीन, समतल||



         


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